Saturday, February 11, 2012

मन बच्चे सा क्यों ना है.....

मन बच्चे सा क्यों ना है.....
मन बच्चे सा क्यो ना है, जो रुठे तो फिर माने भी
चिडिय़ोंं की भाषा समझे, तितली उसको पहचाने भी।
मन बच्चे सा क्यों ना है....
जीने की दुश्वारी में एक पल भी बच्चा ना रह पाया
कच्ची उम्र में जीते एक पल भी कच्चा ना रह पाया
कच्चा बच्चा पक्का अच्छा, बचपन से ही जाने भी।
मन बच्चे सा क्यों ना है....
संगी साथी खेल खिलौने बीते दिन की बातें होंगी
सुनी कभी जो लंबी कहानी और छोटी रातें होंगी
बचपन जो जी ना पाया, कहां कहानी वो जाने भी।
मन बच्चे सा क्यों ना है.....
शाम ढले घर आया हूं, हाथों को लेकर फिर खाली
बच्चे के गालों पर पहले थपकी फिर दी झूठी ताली
मैं समझूं बच्चा बहल गया पर वह सबकुछ जाने भी।
मन बच्चे सा क्यों ना है.....

Saturday, January 28, 2012

भविष्य

खेलने की उम्र में जो पत्थर तोड़ते दिख रहे हैं
सियासतदां इन्हें ही भविष्य देश का कह रहे हैं
कंधों पर बस्ते की जगह बेलदारी केबोझ लदे हैं
देश केभविष्य हैं और ढाबों में बर्तन धो रहे हैं

किरदार

तुमने कह तो दिया मैं हर रोज किरदार बदलता हूं
चलो सच बोलता हूं, मैं कुछ भी नहीं छिपाऊंगा
मैं आइना हूं, अपनी फितरत कैसे बदल दूं भला
तुम किरदार जैसे हो मैं वैसा ही नजर आऊंगा।

Thursday, January 12, 2012

मैं आईना हूं

 मैं आईना हूं, बेबाक हो कर सामने आ जाना
शफ्फाक हो तुम अगर, मैं बेदाग नजर आऊंगा
किरदारों से मत हो जाना कहीं तुम पर्दानशीं
तफ्सील से पढ़ लेना खुली किताब नजर आऊंगा
हर्र्फों के मायने बिला शक ईमान से बयां करना
खुदगर्जी से मत पढऩा मुझे वरना बदल जाऊंगा
गुजारिश यह भी है सियासतों से दूर रखना मुझे
सच का सिला पत्थर होगा और बिखर जाऊंगा॥

Saturday, January 7, 2012

सियासत का जख्म

कड़वाहट खूब देते हैं, यह आदत किसकी है
हिस्सों में बांट देते हैं, यह सियासत किसकी है
हिस्सों के जख्म पर मरहम भी देख के लगते हैं
सुखन महसूस करते हैं, यह नफासत किसकी है....

Monday, December 26, 2011

घर के आले पर जुगनू

सूरज खोजे नया बसेरा, जुगनू घर के आले पर है
रोटी देने की ड्यूटी थी जिनकी नजर निवाले पर है
फिर से अब वो झुका रहे सर, घूम रहे हर घर पर
कुर्सी की चाहत छलके, नजरें सत्ता केप्याले पर हैं॥
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हर पांच साल पर जनता जमान की जय हो
मंदी में डूबा देश सेंसेक्स के उड़ान की जय हो
साहब महंगाई दर धीरे धीरे पहुंच रही जीरो पर
सिफर महंगाई में भी जेब के कटान की जय हो॥
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नीला खेमा, केसरिया बाना, रंग तिरंगा सजा हुआ
सत्ता संग्राम में शेर भी उतरे कहीं सियार रंगा हुआ
कुछ हाथों में तलवार दुधारी, कुछ जीभें बनी कटारी
संभलो, फिर न शिकायत करना, अब भी दगा हुआ॥
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कृपया किसी को न बहकाए
अपनी आदतों से बाज आएं
क्षेत्र-जाति वाद न सिखाएं
विकास के बूते लडऩे आएं
जन बल धीरे से जग रहा है
आयोग भी पेंच कस रहा है॥

Saturday, December 3, 2011

सियासत का चेहरा

सियासत का ये कौन सा चेहरा है
बागबां था अब तलक आज वो लुटेरा है
रोशन हैं महलों दुमहलों के परकोटे
कल्लू की गली में आज भी अंधेरा है।

जश्न-ओ-जाम में रंगीन हुई शाम है
सफेद लिबास में नंगई खुले आम है
चुपचाप सो गए दिन के स्याह चूल्हे
कल्लू के घर में फांके सुबहो शाम है
खुशी के रंग कैद कर हाथ बांधे बैठा है
आज बेईमान हुआ कौन ये चितेरा है।

बेफिक्र सा हुस्न ले साकिया छेड़ रही
लाल परी होंठ से होंठ ले खेल रही
खून के रंग, बू कौन यहां देख रहा
भुने हुए गोश्त की महक बड़ी तेज रही
सौदा हलाल का कल्लू रहा खाली हाथ
मंत्री आवास या बेईमानों का बसेरा है।

विलायती बिस्कुटों पर कुत्ते फिर लड़ गए
मालिकों के सामने हक पर अपने अड़ गए
काट काट नोंच खा लहूलुहान हो गए
बची हुई हड्डियों को चूस कर सो गए
कल्लू ये पूछ रहा कौन सा ये लोकतंत्र
कैसे ये रात ढली कौन सा सबेरा है।

रोशन हैं महलों दुमहलों के परकोटे
कल्लू की गली में आज भी अंधेरा है।