Wednesday, March 2, 2011

लिबास कि कीमत

न हद में रहें न बेहिसाब रहें
भले दिल कहे कि  हम शराब रहें
लगती है तो लगने दे कीमत लिबास कि
आदमी है कोशिश कर आदमियत लाजवाब रहे.

अंतिम यात्रा

कभी कभी कंधो की तलाश होती है
कभी कभी कन्धों पर लाश होती है
सांस साथ छोड़ दे सभी साथ होते हैं
तब कोई नहीं पूछता जब सांस होती हैं


Sunday, February 6, 2011

नूराकुश्ती

अपनी दुश्मनी के रंग कुछ ऐसे मिले हुए
कभी हम सांप बने तो कभी तुम नेवले हुए
दांत एक दूजे पर हम ज़रा सँभाल कर रखे
दोनों को पता है यह तेज गरल से भरे हुए.

राजनीति और नौकरशाही के गठजोड़ का यही असली रंग है. कष्ट यह है कि मीडिया भी इस नूराकुश्ती का लुत्फ़ लेते हुए अपना फायदा तलाश रही है.
बृजेश kumar दुबे

Friday, February 4, 2011

धूल का गुबार

दर्द को जुबा न मिली, बात कि न बात बनी
हकीकतें छिपी रही काफिला निकल गया
पैबंद से ढका रहा खामियों का सिलसिला
गाँव था जो धूल भरा धूल से अटा रहा


आगरा दौरे पर सीऍम  आयीं लेकिन ग्रामीणों का दर्द नहीं जाना...., कमियाँ वैसे ही रही, हकीकत सामने नहीं आ पाई. 

Monday, January 17, 2011

दुकान

दुकान पर हो बिकोगे एक दिन जरूर
किसने कहा बस सामान ही बिकता है
यह तो हुनर पर है कि मोल क्या लगा
कीमत अच्छी हो, इंसान भी बिकता है

चिता का साजो सामान है तो क्या
वह दुकानदार है अपना मुनाफा कमाएगा
हकीकत पर शर्मिंदा होने कि जरूरत नहीं
बाजार में झूठ का स्यापा भी मिल जायेगा.



बृजेश कुमार दुबे

Thursday, January 13, 2011

रोशनी के लिए

डाल दो मुझको मिटटी के दिए में
उम्र भर जलता रहूँगा.
दूंगा प्रकाश सुरभित सुंगधित मैं
गहन तिमिर हरता रहूँगा.
वेदना न होगी मुझे
यूं उम्र भर जलने की
प्रकाश के हेतुक स्वयं
अखंड ज्योति बन जलता रहूँगा.
या यज्ञ में तुम होम कर दो मुझे
आहुति की समिधा बनाकर
यज्ञ पूर्ण हो बलिदान का
पूर्णाहुति बन जलता रहूँगा.
या कर दो चिर समाधि में लीन मुझको
अनंत का एक कण बनाकर
पर गहन तिमिर हरने के हेतुक
पुनश्च प्रकाश बन जलता रहूँगा.

Tuesday, January 11, 2011

"नींव का पत्थर"

" जो जमीन में धंसा हुआ, वो नींव का पत्थर है,
इस पर दीवार खड़ी होती है तभी छत की बात करते हैं"