Monday, November 7, 2011

टुकड़े

मुद्दा यह नहीं कि मंजिल क्या है
सवाल यह है हम चले कितनी दूर
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खुद से मुकाबिल हुए तो टूट गए
मांगी पनाह थी, हिस्से गुनाह आया
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तेरे नाज हमने यूं ही नहीं उठाए हैं
तेरे साथ निगाहें हम पर भी होती हैं
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बृजेश


तपिश

ठंडे हाथों की तपिश अब तलक तारी हैं
कान के पीछे फूंकों की कुछ खुमारी है
नजर से नजर पढऩे का सिलसिला था जो
शुरू कब का हुआ और आज भी जारी है
ठुनकियों का जवाब कुछ चिकोटियां थीं
एक पल को लगा सारी कायनात हमारी है
सासों का सरगम स्पर्शों को खुद आतुर है
पास-पास हैं फिर भी दूर होने की तैयारी है

उंगलियां

मैं कैसे कह दूं अपनी उंगलियों से तू मत गा प्रेम गीत
जब यह कलम बनती हैं तो कमाल लिखती हैं
किसी की उंगलियां छू लें तो दिल का हाल लिखती हैं
कहीं आंखों पर ठहरती हैं तो उसके सवाल लिखती हैं
और अपने पर आ जाएं तो फिर बातें बेमिसाल लिखती हैं

टूटते तारों से मांगा था

प्रेम की चौपाई अब गजल होने लगी
जिक्र उनका क्या हुआ, आंखें सजल होने लगी
टूटते तारों से मांगा था भला मिलता भी क्या
गीत अपरिमित गा रही सांसे सिफर होने लगी।।

जरूरी है गांव हो

नजर आसमां पर जमीं पर पांव हो
धूप सा जज्बा हो पर दिल में छांव हो
टूटते घरों से बढ़ गई मकानों की दरयाफ्त
पर जिंदा रहने के लिए जरूरी है गांव हो
तुम्हारे हाथ हैं तैर कर पार कर लो दरिया
जो बेबस हैं उनके लिए जरूरी है नाव हो

दर्द का साज

जब मैं दर्द के साज सजाता हूं 
तो ही गीत नया गा पाता हूं
अपने तीरों से घायल होता हूं
अपना लहू बहाता हूं, तो ही गीत नया गा पाता हूं..
नाखूनों से खुरची हैं मैंने मन की दीवारें
मौन हुआ हथियार मेरा, ये ही मेरे हत्यारे
चोटिल कदमों को जब बोझिल पा जाता हूं
तो ही गीत नया गा पाता हूं, तो ही गीत नया गा पाता हूं...
सांझ ढले दुबके सूरज से दो-दो हाथ करूं मैं
मत डूबे, रात न हो, फिर फरियाद करूं मैं
अंधियारी रातों में जब यादों से घिर जाता हूं
तो ही गीत नया गा पाता हूं, तो ही गीत नया गा पाता हूं...