Monday, November 7, 2011

बुतशिकन

बुतशिकन कहलाने में जिन्हें मजा आए
वो आज फिर किसी का घर तोड़ आए
मासूम आंखों में बस खून का मंजर था
दरिंदे उसे लाश पर बिलखता छोड़ आए
उनकी आंखों में जगा है हैवानियत का अंघेरा
रात फिर किसी घर की रोशनी उठा लाए
खुदा से इश्क को कुछ यूं बे वास्ता कर दिया
खुदाई के नाम पर मजनूं को पत्थर मार आए 

काफिर

काफिर नहीं हो जाता सिर्फ बुतपरस्ती से कोई
वरना, मुसल्लम ईमान में इश्क भी अज़ाब होता
बुरे वक्त में भी कायम रहा अपनी जहीनियत पर
वरना जो मसाइल था उसमें मैं भी बेहिसाब होता
जानता हूं, मांगूगा तो खुदा सब दे देगा मुझे
मांगता नहीं कुछ वरना मैं भी बदमिजाज होता
मैं बेअदब नहीं, बेइंतिहाई बदगुमान दारोगा की थी
गरीब निकला, वरना मेरे जख्मों का भी हिसाब होता

Sunday, November 6, 2011

मासूम बेटी

बेलती थी रोटियां बेटियों के वास्ते
रोटियों केवास्ते बेटियां ही बिक गई
नर्म नर्म लोइयां, छुईमुई सी बेटियां
देहयष्टि खिल गई आंख उन पर गड़ गई।।
जल गई हैवान में देह की भट्टियां
हवस उठ खड़ा हुआ रेंग गई चीटियां
खेत में पड़ी मिली शव बनी बेटियां
मासूम सी जान बनी गोश्त की भट्टियां।।
तमाशबीन देख कर मुंह छुपा चले गए
अखबार में खबर छपी, फिर सभी भूल गए
हैवान से बड़ी हुई समाज की हैवानियत
चुभते सवाल में घिर गई बेटियां।।
सुन सका ना चीख वो न्याय का जो देवता
दिखा नहीं कि आंख पर बंधी रही पट्टियां
खेलता था बचपना आंगन औ चौबारे में
डूब गई किलकारियां रह गई बस सिसकियां।।
कौन है सवाल करे कौन है जवाब दे
हादसे तारीख में तब्दील हो के रह गए
रात फिर चीख उठी दर्द भरी खेत से
हैवान फिर उठा चला मासूम सी बेटियां।।


Saturday, November 5, 2011

वो अनजान हुआ

घर में खुशहाल था एक आंगन मेरे
कई हुए तो बियाबान सा लगता है
दीवारों पर उभर आईं हैं दरारें बहुत
अब ढही छत दिल हलाकान सा रहता है॥
मेरे घर में खुल गए हैं दरवाजे कई
हर एक पर शक दरबान सा रहता है
जरा सी आहट से चौंक उठता है मन
मुझमें डर जमे मेहमान सा रहता है॥
मेरा घर अब सुनसान सा लगता है
बदलते वक्त में मकान सा लगता है
थाली में कौर बांटता था जो कभी
चूल्हा बटा तो हर शख्स अनजान सा लगता है॥

बेबसी

खुशियों की किलकारी गूंजी, सबने उसको दुलराया
मां होने का सुख पाकर आंचल में दूध उतर आया
पर एक परत दंश की थी, चुपके से आकर पसर गई
मासूम वो घंटों नंगा था, जो अभी अभी दुनिया में आया

७ अरब होने में भागीदारी करने वाले आगरा के बच्चे के लिए
जिसे १२ घंटे तक कपडे भी नसीब न हुए

सियासत

ये कौन है सियासती ये किसकी करामात है
बुझा बुझा है आसमां, सहमी हुई सी रात है
कौन घोल गया भला फिजा में रंग जहर भरा
चाँद हुआ मलिन मलिन कहीं तो कोई बात है

 

Tuesday, May 10, 2011

जिबह ज़मीर की सरगोशियाँ

लहू की सरगोशियाँ कान तक पहुंची आँख में खून उतर आया
चलो अच्छा है, मालूम तो चला शैतान अभी जिन्दा है
पर ये पूरा सच नहीं है, उसमे कुछ इंसां सा बाकी है
सुना है वो अपनी गलती पर बेहद शर्मिंदा है,
दरअसल हर रोज़ जिबह होता है ज़मीर ज़रुरत के हक़ में
वो दिल से बहूत दूर है, बस पापी पेट का कारिन्दा है,
वो कैसे गायेगा इंसानियत के साज़, होगा इंसां सा-जिंदा 
दरअसल वो आज भी मुर्दों के शहर का बाशिंदा है.google